भारत के निर्वाचन आयोग (ECI) के भीतर प्रशासनिक कार्यप्रणाली, मतदाता पंजीकरण और चुनावी नामावली (Electoral Roll) के आईटी प्रबंधन को लेकर सामने आई एक खोजी रिपोर्ट ने संवैधानिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों के दौरान आयोग के कई प्रशासनिक आदेशों और व्यवस्थाओं पर कम से कम 14 बार औपचारिक लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं। हालांकि, निर्वाचन आयोग ने 23 सितंबर 2026 को इन रिपोर्टों को खारिज करते हुए आधिकारिक तौर पर स्पष्ट किया कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) सहित आयोग के सभी नीतिगत व प्रशासनिक निर्णय मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा दोनों चुनाव आयुक्तों की पूर्ण सर्वसम्मति (Unanimous Approval) से ही लिए गए हैं।
विवाद की जड़: Form 6 में बदलाव, ECINet और डेटा केंद्रीकरण
जांच रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों द्वारा उठाए गए बिंदु मुख्य रूप से मतदाता सूची के संशोधन, अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र और सॉफ्टवेयर नियंत्रण से जुड़े थे। विवाद के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:
- Form 6 में घोषणा (Declaration) जोड़ने पर आपत्ति: नए मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले वैधानिक Form 6 में SIR के दौरान एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई, जिसमें आवेदक से पूछा गया कि क्या उनके, उनके माता-पिता या दादा-दादी के नाम पूर्व SIR सूची में दर्ज थे। रिपोर्ट के अनुसार, आयुक्त विवेक जोशी ने 16 मई 2026 को इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि वैधानिक फॉर्म में बदलाव केवल नियमावली संशोधन के जरिए हो सकता है। 13 अगस्त 2026 को आयुक्त संधू ने इसे प्रक्रियागत रूप से 'अनाधिकृत' बताते हुए हटाने का नोट दर्ज कराया।
- ECINet और ग्राउंड ऑफिसर्स के अधिकार: आयोग ने जनवरी 2026 में ECINet को मतदाता सूची तकनीक के बैकबोन के रूप में पेश किया था। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने डेटाबेस के बढ़ते केंद्रीकरण पर चिंता जताई कि इससे जमीनी स्तर पर तैनात इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स (EROs) के वैधानिक निर्णय लेने के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
- कैबिनेट सचिव को पत्राचार: आंतरिक मतभेदों के बीच दोनों आयुक्तों द्वारा कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन को पत्र लिखकर आयोग के आईटी प्रशासन और कार्य आवंटन में हुए बदलावों से जुड़े प्रशासनिक विषयों पर अवगत कराने का दावा भी रिपोर्ट में किया गया है।
"भारत के निर्वाचन आयोग के सभी निर्णय, जिनमें स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) भी शामिल है, पूर्णतः सर्वसम्मति से और दोनों चुनाव आयुक्तों तथा मुख्य चुनाव आयुक्त की मंजूरी के साथ लिए गए हैं," आयोग के सूत्रों ने स्पष्ट किया।
वैधानिक ढांचा: बहुमत और सर्वसम्मति का नियम क्या कहता है?
संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत संचालित तीन-सदस्यीय निर्वाचन आयोग के कामकाज का वैधानिक आधार मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 में निहित है। इस अधिनियम की धारा 18 के अनुसार:
- आयोग का कार्य जहां तक संभव हो सर्वसम्मति (Unanimously) से संचालित किया जाएगा।
- यदि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों के बीच किसी विषय पर मतभेद होता है, तो ऐसे मामले का निपटारा बहुमत (Majority Opinion) के आधार पर किया जाएगा।
- मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) और Registration of Electors Rules, 1960 के तहत निर्देशित होती है।
प्रशासनिक विशेषज्ञों के अनुसार, किसी बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय की आंतरिक फाइलों पर नोटिंग या भिन्न दृष्टिकोण दर्ज होना स्वाभाविक संस्थागत विमर्श का हिस्सा होता है, जिसे औपचारिक रूप से फैसला खारिज होने के समकक्ष नहीं माना जा सकता।
13 करोड़ प्रविष्टियों का दायरा और आगे का घटनाक्रम
जांच रिपोर्ट के अनुसार, बिहार से शुरू होकर 30 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों तक फैली SIR प्रक्रिया ने 13 करोड़ से अधिक मतदाता प्रविष्टियों को प्रभावित किया। रिपोर्ट में गोवा में सॉफ्टवेयर संबंधी समस्या के कारण 97 योग्य मतदाताओं के नाम छूटने और पश्चिम बंगाल में एक ही लॉगिन के तहत 16 लाख अपीलों के दर्ज होने जैसे डेटा प्रबंधन संबंधी चिंताओं का भी उल्लेख किया गया था, जिन पर अब आयोग की विस्तृत प्रक्रियात्मक स्थिति पर नजर रहेगी। ECI द्वारा सर्वसम्मति की पुष्टि किए जाने के बाद अब ध्यान इस बात पर है कि वैधानिक तकनीकी सुधारों और Form 6 के औपचारिक प्रारूप पर आयोग की ओर से आगे क्या आधिकारिक गजट विवरण साझा किया जाता है।
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