भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) और नए मतदाता पंजीकरण के फॉर्म-6 (Form 6) के प्रारूप को लेकर केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और विपक्षी दलों के बीच एक बड़ा संवैधानिक व राजनीतिक टकराव शुरू हो गया है। 30 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में हुई विपक्षी INDIA गठबंधन की उच्चस्तरीय बैठक के बाद नेताओं ने चुनाव आयोग की स्वायत्तता पर सवाल खड़े करते हुए 6 अक्टूबर 2026 को संसद सदस्यों के चुनाव आयोग मुख्यालय तक विशाल मार्च का ऐलान किया है। विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को आंदोलन का केंद्रीय मुद्दा बना दिया है।

फॉर्म-6 का विवाद और चुनाव आयोग का आंतरिक मतभेद

इस पूरे प्रकरण का सबसे तकनीकी और संवेदनशील पहलू फॉर्म-6 है, जिसके जरिए भारत का कोई भी पात्र नागरिक पहली बार अपना नाम मतदाता सूची में दर्ज कराने के लिए आवेदन करता है। चुनाव आयोग ने अपने डिजिटल ECINET पोर्टल पर फॉर्म-6 के साथ एक अतिरिक्त घोषणा पत्र (Declaration) जोड़ दिया था, जिसके तहत नए आवेदकों को यह प्रमाणित करना था कि क्या उनका या उनके माता-पिता/दादा-दादी का नाम पिछली SIR सूची में दर्ज था या नहीं।

खोजी रिपोर्टों के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इस बदलाव पर औपचारिक रूप से गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई थीं। आयुक्तों का तर्क था कि मतदाता पंजीकरण नियमावली, 1960 के तहत वैधानिक रूप से तय फॉर्म में नियमों में संशोधन किए बिना ऐसा अतिरिक्त खंड जोड़ना प्रक्रियात्मक दृष्टि से अनुचित था। बढ़ते विवाद के बीच आयोग ने उन राज्यों में इस घोषणा पत्र को वापस ले लिया है, जहां पुनरीक्षण का कार्य पूरा हो चुका है।

"आयोग के भीतर अलग-अलग राय या लिखित टिप्पणियां एक जीवंत बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था की सामान्य विचार-विमर्श प्रक्रिया का हिस्सा हैं। आयोग के सभी प्रशासनिक निर्णय वैधानिक नियमों के तहत सर्वसम्मति से लिए गए हैं," चुनाव आयोग के आधिकारिक सूत्रों का पक्ष है।

13 करोड़ से अधिक नामों का दावा: राजनीतिक आरोप बनाम जमीनी हकीकत

कांग्रेस कार्यसमिति और विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि देश के करीब 30 राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में चलाए गए SIR अभियान के तहत 13 करोड़ से अधिक नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए हैं। कांग्रेस ने इन सभी नामों को तुरंत बहाल करने की मांग की है।

हालांकि, प्रशासनिक और विधिक दृष्टिकोण से इन 13 करोड़ नामों को सीधे "स्थायी रूप से हटाए गए मतदाता" कहना वस्तुस्थिति से परे है। चुनावी नियमों के तहत SIR एक बहु-चरणीय प्रक्रिया है:

  • तार्किक विसंगतियों की पहचान: सॉफ्टवेयर द्वारा डुप्लिकेट, स्थानांतरित या मृत मतदाताओं की प्रारंभिक पहचान कर ड्राफ्ट तैयार किया जाता है।
  • दावे और आपत्तियां: ड्राफ्ट सूची सार्वजनिक होने के बाद नागरिकों और राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंटों (BLAs) को आपत्तियां दर्ज कराने का वैधानिक अवसर मिलता है।
  • घर-घर जाकर सत्यापन: आयोग ने निर्देश दिया है कि जिन मतदाताओं के नाम अनमैप्ड हैं, बूथ लेवल अधिकारी (BLOs) उनके घर जाकर दस्तावेज एकत्रित करेंगे ताकि किसी भी पात्र नागरिक को कार्यालयों के चक्कर न काटने पड़ें।

INDIA गठबंधन का 4-चरणीय आंदोलन कार्यक्रम

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की उपस्थिति में तय किए गए कार्यक्रम के अनुसार, विपक्षी दलों ने संसद से लेकर सड़क तक मोर्चा खोलने का खाका तैयार किया है:

  • 2 से 8 अक्टूबर: देश भर में जिला स्तर पर 'लोकतंत्र बचाओ' मार्च और जिलाधिकारियों (DMs) के दफ्तरों पर प्रदर्शन।
  • 6 अक्टूबर: सभी विपक्षी सांसदों द्वारा संसद भवन से नई दिल्ली स्थित चुनाव आयोग मुख्यालय तक विरोध मार्च।
  • राष्ट्रपति से मुलाकात: अक्टूबर के दूसरे सप्ताह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिलकर संवैधानिक बाधाओं पर ज्ञापन सौंपना।
  • न्यायिक कदम व रैलियां: 2023 के चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून और मतदाता सूची विसंगतियों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देना और देश भर में 5 बड़ी रैलियां आयोजित करना।

तकनीकी समीक्षा समिति और भाजपा का पलटवार

विवाद को शांत करने और डिजिटल प्रणाली की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग ने वरिष्ठ उप-चुनाव आयुक्त की अध्यक्षता में ECINET सॉफ्टवेयर की समीक्षा हेतु विशेषज्ञ समिति का गठन किया है, जिसमें IIT अथवा IIIT के स्वतंत्र तकनीकी विशेषज्ञ को शामिल किया गया है। यह समिति जांच करेगी कि सॉफ्टवेयर में किसी भी स्तर पर प्रक्रियात्मक खामी तो नहीं है।

दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने विपक्ष के इन हमलों को आगामी चुनावों से पहले हार का बहाना ढूंढना करार दिया है। पार्टी प्रवक्ताओं ने कहा कि मतदाता सूची को फर्जी प्रविष्टियों से मुक्त करना और शुद्धता बनाए रखना चुनाव आयोग का संवैधानिक कर्तव्य है। विपक्ष द्वारा देश की सर्वोच्च चुनाव संस्था की गरिमा को राजनीतिक लाभ के लिए ठेस पहुंचाई जा रही है। 6 अक्टूबर को सांसदों के प्रस्तावित मार्च के बाद यह तय होगा कि यह टकराव प्रशासनिक सुधार की ओर बढ़ता है या एक लंबी अदालती जंग का रूप लेता है।