केंद्र और राज्यों के विधायी अधिकारों के संतुलन के बीच एक बड़ा संवैधानिक घटनाक्रम सामने आया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पश्चिम बंगाल विधानसभा द्वारा पारित विवादास्पद 'एंटी-गुंडा बिल' (Anti-Gunda Bill) को अपनी मंजूरी देने से इनकार कर दिया है। इसे पश्चिम बंगाल सरकार के लिए एक बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक झटके के रूप में देखा जा रहा है। केंद्र सरकार की समीक्षा में पाया गया कि इस प्रस्तावित कानून के कई प्रमुख खंड संसद द्वारा पारित केंद्रीय कानूनों के साथ सीधे कानूनी विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न कर रहे थे।

विवाद का मुख्य कारण: NDPS एक्ट और अनुच्छेद 254 का पेंच

गृह मंत्रालय और विधि विशेषज्ञों की समीक्षा के अनुसार, इस विधेयक में उल्लिखित 'गुंडा' की परिभाषा और निवारक हिरासत (Preventive Detention) के प्रावधान केंद्रीय कानून नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) एक्ट, 1985 के साथ ओवरलैप कर रहे थे। भारतीय संविधान की समवर्ती सूची (Concurrent List) के विषयों पर यदि राज्य का कोई कानून केंद्रीय कानून से टकराता है, तो अनुच्छेद 254 के तहत केंद्रीय कानून को प्राथमिकता मिलती है।

"जब किसी राज्य विधेयक के प्रावधान केंद्रीय संविधि के साथ असंगत होते हैं, तो संवैधानिक स्पष्टता सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रपति की सहमति को रोका जा सकता है ताकि न्यायिक शून्यता या दोहराव से बचा जा सके," संवैधानिक जानकारों का मत है।

राज्य सरकार के सामने अब क्या हैं विकल्प?

सहमति रोके जाने के बाद अब यह विधेयक स्वतः कानून नहीं बन सकता। पश्चिम बंगाल सरकार को अब इस कानून के उन अनुभागों में संशोधन (Amendments) करने होंगे जो केंद्रीय कानूनों के साथ विरोधाभास पैदा कर रहे हैं। राज्य के विधि विभाग द्वारा आवश्यक कानूनी सुधार करने के बाद इसे दोबारा विधानसभा में पेश करना होगा, जिसके बाद ही संशोधित रूप में इसे पुनः राज्यपाल और राष्ट्रपति की संस्तुति के लिए भेजा जा सकेगा।

राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक हलचल

यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब देश के विभिन्न हिस्सों में संवैधानिक प्रक्रियाओं और स्वायत्त संस्थाओं के कामकाज को लेकर राजनीतिक बहस तेज है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली और चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर विपक्षी दलों व नागरिक संगठनों द्वारा विरोध जताया जा रहा है। वहीं, उत्तर प्रदेश में राजनीतिक समीकरणों और सम्मेलनों में जनभागीदारी को लेकर सियासी गतिविधियां बनी हुई हैं। राष्ट्रपति द्वारा बंगाल के बिल पर रोक लगाए जाने से केंद्र-राज्य संबंधों में विधायी संतुलन का प्रश्न एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गया है।