नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 'द हिंदू' अखबार में लेख लिखकर गृह मंत्री अमित शाह पर दिल्ली में छात्रों पर हुई हिंसा को लेकर तीखा हमला बोला, यह कहते हुए कि उनकी करीब 20 दिन की चुप्पी हिंसा को दी गई मंजूरी के समान है। उन्होंने शाह के इस्तीफे और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में स्वतंत्र जांच की मांग की। इस लेख के बाद 29 जुलाई को संसद में भी भारी हंगामा हुआ, जब राहुल गांधी का भाषण अधूरा छोड़ना पड़ा। कांग्रेस नेताओं जयराम रमेश और मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी राहुल गांधी की मांग का समर्थन किया है।
- राहुल गांधी ने 'द हिंदू' में लेख लिखकर गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग की।
- उन्होंने कहा कि शाह की करीब 20 दिन की चुप्पी हिंसा को दी गई मंजूरी के समान है।
- जयराम रमेश और मल्लिकार्जुन खड़गे सहित कांग्रेस नेताओं ने राहुल गांधी के लेख का समर्थन किया।
- 29 जुलाई को संसद में राहुल गांधी का भाषण हंगामे के बीच अधूरा छोड़ना पड़ा।
- विपक्ष जंतर-मंतर हिंसा की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग पर अड़ा हुआ है।
एक लेख जिसने दिल्ली की सियासत में भूचाल ला दिया
दिल्ली से करीब 500 मीटर दूर, संसद भवन की परछाई में ही हुई एक हिंसक घटना ने आज देश की राजनीति को झकझोर कर रख दिया है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सोमवार को अंग्रेजी दैनिक 'द हिंदू' में एक तीखा लेख लिखकर सीधे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को निशाने पर लिया। उन्होंने साफ शब्दों में लिखा कि 20 जुलाई को नीट-यूजी पेपर लीक को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर जो कहर बरपा, उसके लिए गृह मंत्री या तो सीधे दोषी हैं, या फिर पूरी तरह नाकाबिल। यह कोई सामान्य राजनीतिक बयान नहीं था — यह एक ऐसा आरोप था, जिसने दिल्ली की गलियों से लेकर संसद के गलियारों तक हलचल मचा दी।
'लगभग 20 दिन हो गए, शाह संसद में नहीं आए'
राहुल गांधी ने एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा, 'टूटी हुई हड्डियों वाले नाबालिग। मोदी सरकार किसी सवाल का जवाब यूं देती है। और गृह मंत्री? लगभग 20 दिन हो गए, अमित शाह इसका जवाब देने संसद तक नहीं आए। विपक्ष का हर चर्चा प्रस्ताव खारिज कर दिया गया।' उनके इस बयान में जो दर्द और गुस्सा झलकता है, वह किसी सामान्य राजनीतिक बयानबाजी से कहीं आगे की बात करता है — यह उन छात्रों के परिवारों की आवाज़ बनने की कोशिश है, जिन्होंने अपने बच्चों को घायल हालत में अस्पताल के बिस्तर पर देखा।
'चुप्पी लापरवाही नहीं, हिंसा की मंजूरी है'
अपने लेख में राहुल गांधी ने जो सबसे तीखी पंक्ति लिखी, वह थी — 'उनकी चुप्पी कोई चूक नहीं है, यह हिंसा को दी गई मंजूरी है।' उन्होंने तर्क दिया कि दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ), दोनों सीधे गृह मंत्रालय के अधीन आते हैं, इसलिए बिना उनकी जानकारी या मंजूरी के इतने बड़े स्तर पर बल प्रयोग संभव ही नहीं था। उन्होंने यह भी कहा कि मोदी सरकार हमेशा अपनी केंद्रीकृत नियंत्रण व्यवस्था पर गर्व करती रही है — चाहे मंगल मिशन हो या ओलंपिक पदक, हर उपलब्धि का श्रेय प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को दिया जाता है। ऐसे में जब बात जवाबदेही की आती है, तो यही सरकार चुप्पी क्यों साध लेती है, यह सवाल राहुल गांधी ने बड़ी तीक्ष्णता से उठाया।
प्रधानमंत्री की छवि पर भी सीधा प्रहार
राहुल गांधी ने इस पूरे प्रकरण को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि से भी जोड़ा। उन्होंने लिखा कि इस घटना ने प्रधानमंत्री की छवि को इस कदर नुकसान पहुंचाया है कि उसे दोबारा बनाया ही नहीं जा सकता। उन्होंने आरोप लगाया कि अपनी छवि बचाने के लिए अब प्रधानमंत्री ने अपनी 'प्रचार मशीनरी' को सक्रिय कर दिया है, जिसे उन्होंने एक 'हताश' कोशिश करार दिया। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी राहुल गांधी के लेख का स्क्रीनशॉट साझा करते हुए लिखा, 'देश अब बहुत हो चुका इस गृह मंत्री का, जो सिर्फ धौंस, दिखावा और डींगों से भरा है। उन्हें इस्तीफा देना चाहिए।' पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी इस लेख को साझा करते हुए कहा कि राहुल गांधी ने देश के युवाओं की आवाज़ को शब्द दिए हैं।
छात्रों से सीधी मुलाकात, दर्द को सुनने की कोशिश
यह पहली बार नहीं है जब राहुल गांधी ने इस मुद्दे को उठाया है। इससे पहले उन्होंने उन छात्रों के एक समूह से सीधे मुलाकात की थी, जो पिछले महीने तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे और 20 जुलाई को कथित पुलिसिया ज्यादती का शिकार हुए थे। छात्रों से घिरे राहुल गांधी ने कहा था, 'उन्होंने मुझे बताया कि कैसे उन्हें पीटा गया, धमकाया गया... उन्होंने संविधान की रक्षा की है, भारत के विचार और भारत के भविष्य की रक्षा की है।' उन्होंने आगे कहा कि टूटी और लचर शिक्षा व्यवस्था के बारे में शिकायत करना कोई अपराध नहीं है — अगर कुछ है, तो यह व्यवस्था ही है जिसे बदलने और सुधारने की जरूरत है, और छात्र बस यही तो मांग रहे थे।
संसद में गतिरोध: शांत होने का नाम नहीं ले रहा तूफान
यह विवाद केवल अखबार के पन्नों या सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित नहीं रहा। 29 जुलाई को लोकसभा में जब राहुल गांधी 'पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) अमेंडमेंट बिल 2026' पर चर्चा के दौरान बोलने खड़े हुए, तो उनका भाषण अमित शाह पर एक बेधड़क हमला बनकर उभरा। यह हमला इतना तीखा था कि स्पीकर ओम बिरला और सत्तापक्ष के सांसदों ने बार-बार उन्हें टोका, और आखिरकार उनका भाषण अधूरा ही छोड़ना पड़ा। रिपोर्टों के अनुसार, यह किसी भी नेता प्रतिपक्ष के साथ पहली बार हुआ कि स्पीकर ने उन्हें तब तक बोलने की अनुमति नहीं दी जब तक वे अमित शाह पर की गई अपनी टिप्पणियों के लिए माफी न मांगें या उन्हें वापस न लें।
विपक्ष की एक ही मांग: सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच
राहुल गांधी और पूरा विपक्ष अब एक ही मांग पर अड़ा हुआ है — इस पूरे घटनाक्रम की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। राहुल गांधी ने चेतावनी भरे लहजे में कहा, 'हम सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग करते हैं। और जब तक उन्हें जवाबदेह नहीं ठहराया जाता, हम लड़ना बंद नहीं करेंगे।' यह सिर्फ एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि उन परिवारों से किया गया एक वादा प्रतीत होता है, जिनके बच्चे इस हिंसा में घायल हुए।
आगे क्या? एक लड़ाई जो सड़क से संसद तक जारी है
इस पूरे घटनाक्रम को देखकर साफ है कि यह मामला अब सिर्फ एक प्रशासनिक चूक भर का नहीं रह गया है — यह जवाबदेही, संवैधानिक मर्यादा और युवाओं की आवाज़ को सुने जाने के अधिकार की लड़ाई बन चुका है। सरकार की ओर से अभी तक अमित शाह के इस्तीफे या सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग पर कोई ठोस प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन जिस तरह यह मुद्दा अखबार के लेखों से निकलकर संसद के गलियारों और सड़क के प्रदर्शनों तक फैल चुका है, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में यह टकराव और तेज़ हो सकता है।
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