दिल्ली हाईकोर्ट ने सोनम वांगचुक को निजी अस्पताल में शिफ्ट करने की याचिका खारिज करते हुए सरकार के सफदरजंग अस्पताल में रखने के फैसले को मनमाना नहीं माना। कोर्ट ने तीन दिन के भीतर उनकी स्वास्थ्य स्थिति पर रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है, जबकि पत्नी गीतांजलि आंगमो ने पोटैशियम जांच में अंतर होने का दावा किया है।
- दिल्ली हाईकोर्ट ने सोनम वांगचुक को निजी अस्पताल शिफ्ट करने की याचिका खारिज की।
- कोर्ट ने सरकार के सफदरजंग अस्पताल भेजने के फैसले को मनमाना नहीं माना।
- कपिल सिब्बल ने अनुच्छेद 21 के तहत अपनी पसंद के डॉक्टर चुनने का अधिकार बताया।
- कोर्ट ने तीन दिन के भीतर स्वास्थ्य स्थिति की रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया।
- याचिका में पोटैशियम टेस्ट रिपोर्ट में अंतर होने का दावा भी किया गया।
दिल्ली हाईकोर्ट में रविवार को विशेष सुनवाई
जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को निजी अस्पताल में स्थानांतरित करने की मांग वाली याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने रविवार को अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। जस्टिस मिनी पुष्करणा की विशेष पीठ ने कहा कि वांगचुक को उनकी लंबी भूख हड़ताल के बाद सफदरजंग अस्पताल भेजने का सरकार का फैसला मनमाना नहीं था। यह याचिका वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंगमो ने सुबह करीब चार बजे दाखिल की थी।
पत्नी की ओर से कपिल सिब्बल की दलील
गीतांजलि आंगमो की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, विवेक टंखा और अखिल सिब्बल पेश हुए। कपिल सिब्बल ने कोर्ट में दलील दी कि सवाल यह नहीं है कि वांगचुक को इलाज की जरूरत है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या राज्य किसी व्यक्ति को उसकी मर्जी के खिलाफ सरकारी अस्पताल में रोक सकता है। उन्होंने अनुच्छेद 21 के तहत वांगचुक के अपनी पसंद के डॉक्टर और अस्पताल चुनने के मौलिक अधिकार का हवाला दिया और मेदांता अस्पताल में शिफ्ट करने की मांग की।
सिब्बल ने यह भी कहा कि वांगचुक के कमरे के बाहर पुलिसकर्मी तैनात हैं और परिवार के डॉक्टरों व वकीलों को उन तक पहुंच नहीं दी जा रही। उन्होंने सवाल उठाया, "उन्हें हिरासत में रखने का कोई आधार नहीं है। क्या मुझे अपनी पसंद के डॉक्टर या अस्पताल का अधिकार नहीं है?" याचिका में सफदरजंग अस्पताल की जांच और परिवार द्वारा स्वतंत्र लैब से कराई गई जांच में वांगचुक के पोटैशियम स्तर के आंकड़ों में अंतर होने का दावा भी किया गया।
केंद्र सरकार का पक्ष
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने केंद्र सरकार की ओर से पेश होते हुए कहा कि करीब तीन हफ्तों की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल के बाद वांगचुक को डिहाइड्रेशन और कीटोसिस की शिकायत हो गई थी, जिसके बाद डॉक्टरों की सलाह पर उन्हें प्रदर्शन स्थल जंतर-मंतर से सफदरजंग अस्पताल शिफ्ट किया गया। सरकार ने कोर्ट के 16 जुलाई के पूर्व आदेश का हवाला दिया, जिसमें तबीयत बिगड़ने की स्थिति में हस्तक्षेप की अनुमति दी गई थी। शर्मा ने भरोसा दिलाया कि वांगचुक का इलाज अस्पताल के डॉक्टरों की निगरानी में हो रहा है।
कोर्ट की टिप्पणी और आदेश
जस्टिस पुष्करणा ने कहा कि चूंकि वांगचुक ने अपनी मर्जी से किसी अस्पताल में भर्ती होने का फैसला नहीं लिया, इसलिए तबीयत बिगड़ने पर सरकार का हस्तक्षेप करना उसके अधिकार क्षेत्र में था। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि वांगचुक ने इलेक्ट्रोलाइट्स, ओरल पोटैशियम सप्लीमेंट और ओआरएस लेने की सहमति दी थी, इसलिए उनके व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने अंतिम आदेश में कहा कि किसी भी चिकित्सीय निर्णय का अंतिम फैसला मेडिकल प्रोटोकॉल के अनुसार डॉक्टरों की टीम करेगी। कोर्ट ने केंद्र सरकार और डॉक्टरों को वांगचुक की स्वास्थ्य स्थिति पर तीन दिन के भीतर स्टेटस रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है।
प्रकरण की पृष्ठभूमि
वांगचुक 28 जून को जंतर-मंतर पर एनईईटी में कथित अनियमितताओं के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों के समर्थन में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे थे। शनिवार सुबह दिल्ली पुलिस उन्हें प्रदर्शन स्थल से हटाकर सफदरजंग अस्पताल ले गई थी, जिसके बाद विपक्षी नेताओं ने इस कार्रवाई पर कड़ी आपत्ति जताई थी।
समर्थन में आवाजें
अभिनेत्री दीया मिर्जा ने भी वांगचुक की भूख हड़ताल को लेकर समर्थन जताया और कहा कि वे शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही, पारदर्शिता और सुधार की मांग के साथ खड़ी हैं। मामले की अगली सुनवाई अब आगामी दिनों में स्वास्थ्य रिपोर्ट पेश होने के बाद निर्धारित की जाएगी।
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