लखनऊ / प्रयागराज: नागरिक स्वतंत्रता, विधिक प्रक्रिया और प्रशासनिक शक्तियों के दुरुपयोग पर कड़ा रुख अपनाते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय (लखनऊ पीठ) ने उत्तर प्रदेश प्रशासन को सख्त चेतावनी दी है। अदालत ने कहा कि न्यायिक मंचों द्वारा बार-बार आगाह किए जाने के बावजूद राज्य सरकार, पुलिस और जिला मजिस्ट्रेट 'उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण अधिनियम, 1970' (UP Control of Goondas Act, 1970) को नागरिकों के खिलाफ 'दमन के हथियार' (Tool of Oppression) के रूप में इस्तेमाल करने की जिद पर अड़े हैं। जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की एकल पीठ ने गोंडा निवासी जाहिद अली (Zahid Ali v. State of UP) की याचिका स्वीकार करते हुए जिला मजिस्ट्रेट द्वारा पारित छह महीने के जिला बदर (Externment) आदेश और देवीपाटन मंडल आयुक्त के अपीलीय आदेश को पूर्णतः निरस्त कर दिया। न्यायिक आदेशों, वाद सूचियों व आधिकारिक फैसलों के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय आधिकारिक पोर्टल देखें।
मामले की पृष्ठभूमि: बरी होने के बावजूद थोपा गया 'गुंडा एक्ट'
अदालत के समक्ष आए मामले में प्रशासनिक लापरवाही और दुर्भावना की गंभीर तस्वीर सामने आई:
- पुराने मुकदमों का आधार: पुलिस प्रशासन ने याचिकाकर्ता के खिलाफ दो मुकदमों का हवाला देते हुए उसे 'गुंडा' घोषित कर छह महीने के लिए जिले की सीमाओं से बाहर करने की संस्तुति की थी।
- तथ्यों को जानबूझकर छिपाना: न्यायिक रिकॉर्ड्स की पड़ताल में हाईकोर्ट ने पाया कि जिन दो मुकदमों का उल्लेख किया गया था, उनमें से एक मामले (वर्ष 2010 की प्राथमिकी) में सक्षम सत्र अदालत ने याचिकाकर्ता को वर्ष 2017 में ही बाइज्जत बरी कर दिया था। इसके बावजूद पुलिस ने इस तथ्य को जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष दबाए रखा।
- वर्तमान संकट से कोई संबंध नहीं: दूसरे मामले (वर्ष 2020) और जिला बदर की कार्रवाई (वर्ष 2026) के बीच लंबा अंतराल था। अदालत ने टिप्पणी की कि वर्षों पुरानी घटनाओं का वर्तमान में सार्वजनिक शांति भंग होने के खतरे से कोई तर्कसंगत संबंध (Reasonable Nexus) स्थापित नहीं किया गया।
हाईकोर्ट के कड़े विधिक सिद्धांत: 'आदतन अपराधी' का पैमाना क्या?
जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने अपने निर्णय में गुंडा एक्ट की मूल भावना और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया:
- निवारक कानून, दंडात्मक नहीं: गुंडा नियंत्रण अधिनियम एक निवारक (Preventive) कानून है, जिसका उद्देश्य भविष्य में होने वाले अपराधों को रोकना है। सामान्य आपराधिक कानूनों (IPC/BNS) के स्थान पर शॉर्टकट अपनाकर किसी व्यक्ति को बिना ट्रायल के प्रताड़ित करना विधिक प्रक्रिया का मजाक उड़ाना है।
- 'आदतन अपराधी' (Habitual Offender) की स्पष्ट परिभाषा: केवल एक या दो अलग-अलग आपराधिक मुकदमों या स्थानीय पुलिस की बीट सूचना रिपोर्ट (Beat Information Report) के आधार पर किसी को आदतन अपराधी नहीं माना जा सकता। कानून की धारा 2(b) के तहत अपराधों की निरंतरता, बारंबारता और समाज के लिए स्पष्ट खतरा सिद्ध होना अनिवार्य है।
- सामाजिक कलंक और प्रतिष्ठा का हनन: अदालत ने रेखांकित किया कि किसी व्यक्ति पर 'गुंडा' का तमगा लगाना उसके सामाजिक जीवन, भविष्य और परिवार के लिए जीवनभर का कलंक बन जाता है। जिलाधिकारियों द्वारा बिना न्यायिक मस्तिष्क का उपयोग किए (Non-application of mind) प्रोफॉर्मा पर हस्ताक्षर करना संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का खुला हनन है।
अधिकारियों की मनमानी पर पूर्व आदेशों की अनदेखी
उच्च न्यायालय ने असंतोष व्यक्त करते हुए कहा कि पूर्व में गोवर्धन बनाम यूपी राज्य सहित कई ऐतिहासिक फैसलों में स्पष्ट निर्देश दिए जाने के बावजूद मऊ, गाजीपुर, अमेठी और अलीगढ़ जैसे जिलों में स्थानीय जमीनी रंजिशों या मामूली विवादों में लगातार गुंडा एक्ट की नोटिसें थोपी जा रही हैं। अदालत ने कार्यपालिका को चेतावनी दी कि यदि असाधारण वैधानिक शक्तियों का उपयोग प्रशासनिक सनक (Whims and Caprice) के आधार पर जारी रहा, तो अदालत जिम्मेदार अधिकारियों पर व्यक्तिगत जुर्माना लगाने से पीछे नहीं हटेगी।
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